Bageshwar Bagnath Dham : बागेश्वर, अत्यंत रमणीय और पावन नगर। जहां पतित पावनी सरयू नदी के तट पर कैलाश पति महादेव शिव बाबा बागनाथ के रुप में निवास करते हैं। साथ में बाबा काल भैरव द्वारपाल के रुप में निवास कर नगर की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालते हैं। इस मनमोहक और पवित्र स्थान का दर्शन और पूजन करने हर साल हजारों की संख्या में श्रद्धालु और सैलानी आते हैं। जिन्हें भगवान शिव के आशीर्वाद के साथ यहां मौजूद आठवीं से चैदहवीं शताब्दी तक की मूर्तियों और शिलालेखों के दर्शन करने का भी सौभाग्य मिलता है।
बागेश्वर को तीर्थराज प्रयाग और हरिद्वार के बराबर का महत्व दिया गया है। सरयू-गोमती और विलुप्त सरस्वती के संगम पर बसे ऐतिहासिक बागनाथ मंदिर की मान्यता के चलते बागेश्वर को कुमाऊं की काशी कहलाने का भी गौरव प्राप्त है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि बागनाथ मंदिर का अस्तित्व कत्यूरी शासन के समय 7वीं शताब्दी से था। मंदिर के संग्रहालय में रखी मूर्तियों और शिलालेखों के माध्यम से भी यह जानकारी मिलती है। हालांकि यहां रखी अधिकांश मूर्तियां व शिलालेख आठवीं शताब्दी के बाद के हैं। जिससे मंदिर के कत्यूरी काल से होने का प्रमाण मिलता है। कहा जाता है कि पहले मंदिर छोटे शिवालय के रुप में स्थापित था। 1602 में चंद शासक लक्ष्मी चंद ने इसे नागर शैली में इसका निर्माण कराया।
भूदेव के शिलालेख से मिलती है ऐतिहासिक जानकारी
इतिहासकारों के अनुसार मंदिर के निर्माण और विस्तार के लिए तत्कालीन चंद राजाओं ने भूमि दान की थी। उन्होंने बाबा बागनाथ कोे राजराजेश्वर का दर्जा भी दिया था। बागेश्वर का पुरातन नाम व्याघ्रेश्वर था। जिसका पहला प्रमाणिक परिचय स्कंदपुराण से प्राप्त होता है। जबकि मंदिर के बारे में पहली ऐतिहासिक प्रमाणिक जानकारी बागनाथ मंदिर में रखी कत्यूरी सम्राट भूदेव के 859 ईसवी के शिलालेख से प्राप्त होती है। नवीं सदी के इस शिलालेख में राजा मसंतदेव और उनके पुत्र द्वारा बागनाथ मंदिर के लिए ग्राम दान करने का उल्लेख मिलता है। मसंतदेव के पुत्र ने ही इस मंदिर को राज सम्मान दिया और राज संरक्षण में लेकर देवालय की समुचित व्यवस्था की। बाद के कत्यूरी शासकों ने भी मंदिर का सम्मान बरकरार रखा। कहा जाता है कि कत्यूरी राजाओं के अवसान के बाद ठकुराई युग रहा। जिस समय राजराजेश्वर व्याघ्रेश्वर भी गुमनामी में खो गए। कुछ समय बाद इनकी पुनः लोक देवता के रुप में पूजा होने का प्रमाण मिलता है।

नागर शैली में बागनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार
लोक कथाओं और लोक गीतों जैसे राजुला मालुशाही आदि के माध्यम से भी बागनाथ की जानकारी मिलती है। बाद में अल्मोड़ा नगर के संस्थापक और चंद राजा नरेश बालो कल्याण चंद के दानपुर विजय के बाद राजा रुद्रचंद ने कत्यूर बैजनाथ को अपने राज्य में मिलाया। राज्य विस्तार के बाद चंद राजाओं ने बागनाथ मंदिर की भी सुध ली और 1602 में राजा लक्ष्मीचंद ने प्राचीन व्याघ्रेश्वर मंदिर का जीर्णोद्धार नागर शैली कराकर विशाल मंदिर का निर्माण किया। उन्होंने इस देवस्थान को राज संरक्षण में लेकर समुचित व्यवस्थाएं उपलब्ध कराई। साल 2012 में बागनाथ मंदिर प्रबंधन समिति ने चंद कालीन जीर्ण हो चुके बाहरी प्रवेश द्वार और दीवार का पुनः निर्माण कराया। इस प्रकार बागनाथ मंदिर में प्रमाणिक तौर पर तीन कालों में निर्माण या पुर्ननिर्माण कार्य किया गया है। पहला कत्यूरी काल सातवीं या आठवीं सदी में, दूसरा चंदकाल सन 1602 और तीसरा आधुनिक या वर्तमान काल 2012 में।
उमा-उमापति संग में हैं मौजूद
बागनाथ मंदिर के गर्भगृह में उमा और उमापति एक साथ विराजमान हैं। यहां स्थापित शक्ति में दो लिंग मौजूद हैं। जो उमा और उमापति के रुप में पूजे जाते हैं। सेवानिवृत्त प्रवक्ता बीडी साह की लिखित पुस्तक श्री बागनाथ चालीसा एवं कथापाठ पुस्तक में श्री बागनाथ विग्रह-द्वय नामक एक कविता के माध्यम से इसकी महत्ता बताई गई है। जिसके अनुसार-
नहीं कहीं शिव आलय ऐसा, बागनाथ, व्याघ्रेश्वर जैसा।
यहां लिंग दो जल हरि में हैं, उमा-उमापति दोनों संग हैं।
अडिग आस्था है भक्तों में, मुनि मंत्रों से स्थिर ये है।
आठवीं सदी के बाद के शिलालेख व मूर्तियां हैं सुरक्षित
बागनाथ मंदिर में आठवीं सदी से 10वीं सदी तक के शिलालेख व मूर्तियां विराजमान हैं। जो पुरातत्व विभाग के अधीन एक कमरे में रखी गई हैं। हालांकि इन्हें रखने के लिए एक भव्य संग्रहालय का निर्माण करने की मांग समय-समय पर उठती रही है, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया है। आठवीं सदी की उमा-महेश, पार्वती, वैष्णवी एवं कौमारी मातृकाएं मौजूद हैं। नवीं सदी की महिषासुर मर्दिनी, हरिहर, उमा-महेश, गणेश, चामुंडा, बाराह, वीणाधारी शिव, त्रिभुजी शिव, ब्रहमाणी, दशावतार पट्ट, पंचदेव पट्ट, माहेश्वरी और दसवीं सदी के भगवान गणेश, उमा-महेश, शेषयाची विष्णु, सहस्र शिवलिंग, चतुर्मुखी शिव, भगवान विष्णु, कार्तिकेय की मूर्तियां, शिलालेख व मातृकापट्ट सुरक्षित रखे गए हैं। जिनके माध्यम से यहां आने वाले सैलानियों और श्रद्धालुओं को मंदिर के वृहद इतिहास को जानने और समझने का मौका मिलता है।
बीडी शाह की पुस्तक में मिलता है वर्णन
कत्यूरियों के राजराजेश्वर व्याघ्रेश्वर से चंद राजाओं के राजसी बागनाथ और आधुनिक बाबा बागनाथ तक की पूरी कथा को सेवानिवृत्त शिक्षक भवानी दास शाह ने अपनी पुस्तक में आकर्षक ढंग से समेटा है। उन्होंने गद्य और काव्य के माध्यम से महादेव शिव और उमा का अनुपम वर्णन सरल ढंग से किया है। पुस्तक में उन्होंने एटकिंसन के गजेटियर की जानकारी देते हुए बागनाथ के पौराणिक महत्व एवं इसकी स्थापत्य पर अधिक शोध करने की प्रेरणा भी दी है। उन्होंने युवाओं से एटकिंसन के गजेटियर एवं पंडित के पुस्तक का गहन अध्ययन करने की भी आवश्यकता को व्यक्त किया है। उन्होंने बताया कि व्याघ्रेश्वर की महत्ता और उनकी स्थापना को लेकर जितना अधिक शोध कार्य होगा, उतना ही बागेश्वर के महत्व को जानने का भी मौका मिलेगा।